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तीन आपराधिक कानूनों को नया नाम

अजीत द्विवेदी
देश में नए आपराधिक कानून लागू हो गए हैं। इस बात को ऐसे भी कह सकते हैं कि अंग्रेजों के जमाने में, 1861 में बने तीन आपराधिक कानूनों को नया नाम मिल गया है और कई अपराधों की धाराएं बदल गई हैं। मुख्य रूप से यही काम हुआ है। बाकी कुछ नए अपराधों को इसमें शामिल किया गया है और कुछ पुराने अपराध इन कानूनों के दायरे से बाहर भी हो गए हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत थोड़ी है। नए कानून एक जुलाई से लागू हुए हैं और उससे पहले सोशल मीडिया में इन पर मीम्स की भी बाढ़ आई थी। जैसे कई लोगों ने कहा कि अब इस देश में कोई ‘श्री 420’ नहीं होगा। अब धोखाधड़ी करने वाले को ‘श्री 318’ कहना होगा।

अगर कोई राजकपूर की आईकॉनिक फिल्म ‘श्री 420’ का रिमेक बनाए तो उसे नए नाम से बनाना होगा क्योंकि सरकार ने फ्रॉड की धारा बदल दी है। इसी तरह हत्या के लिए 302 की जगह 101 धारा आ गई है और हत्या के प्रयास के लिए 307 की जगह 109 धारा लगेगी। बलात्कार के आरोप में 375 और 376 की जगह धारा 63 और 64 के तहत मुकदमा चलेगा। पुलिस वालों, वकीलों, न्यायिक अधिकारियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को नई धाराएं याद करनी होंगी और पुरानी भी याद रखनी होंगी क्योंकि एक जुलाई 2024 से पहले के सारे मामले पुरानी धाराओं में सुने जाएंगे।

सवाल है कि इसके पीछे क्या तर्क हो सकता है? ज्यादातर लोग अभी तक कोई ठोस तर्क नहीं सोच पाए हैं सिवाए इसके कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम इतिहास में दर्ज होगा कि उन्होंने अंग्रेजों के बनाए आपराधिक कानूनों को बदला था। जो कानून 1861 से चल रहे थे और ‘गुलामी की मानसिकता’ का प्रतीक थे उनको 2024 में नरेंद्र मोदी ने बदल दिया। उन्होंने इंडियन पीनल कोड यानी भारतीय दंड संहिता का नाम भारतीय न्याय संहिता कर दिया। अपराध प्रक्रिया संहिता का नाम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता कर दिया और साक्ष्य कानून का नाम भारतीय साक्ष्य संहिता कर दिया। अगर तीनों आपराधिक कानूनों में बड़े बदलाव की बात करें तो वह ये है कि भारतीय दंड संहिता में 511 धाराएं थीं, जिन्हें कम करके 356 कर दिया गया। कई धाराएं एक दूसरे को ओवरलैप कर रही थीं तो उनको आपस में मिला दिया गया।
सीआरपीसी में पहले 484 धाराएं थीं लेकिन उसकी जगह बने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में इनकी संख्या बढ़ कर 531 हो गई है। दूसरा बड़ा बदलाव यह हुआ कि कुछ अपराध की धाराएं बदल दी गईं हैं। इन धाराओं को नए सिरे से याद करना होगा। मुश्किल यह है कि देश की अदालतों में पांच करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं, जिनमें से साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा आपराधिक मामले हैं। उन सभी साढ़े तीन करोड़ मुकदमों में पुरानी धाराओं के तहत ही सुनवाई होगी। यानी पुलिस में अभियोजन का काम देख रहे अधिकारियों, वकीलों, न्यायिक अधिकारियों आदि को 30 जून से पहले के केस के लिए पुरानी धाराएं याद रखनी हैं और एक जुलाई से जो मुकदमे दर्ज होंगे उनके लिए नई धाराएं याद रखनी होंगी।

बहरहाल, तीसरा बदलाव यह है कि नए कानून में कुछ नए अपराध शामिल किए गए हैं। झांसा या लालच देकर शारीरिक संबंध बनाने पर नई धारा के तहत मुकदमा चलेगा। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से अदालतों ने ऐसे मामलों में राहत देनी शुरू की थी। इसी तरह विवाहित स्त्री को बरगलाने के अपराध की एक अलग धारा बनी है। माना जा रहा है कि कथित लव जिहाद रोकने की सोच के साथ ये नई धाराएं शामिल की गई हैं। नाबालिग पत्नी से संबंध बनाने को बलात्कार की श्रेणी में डाला गया है। एक दिलचस्प बात यह है कि यौन अपराधों पर इतना ध्यान देने के बाद भी सरकार ने पुरुषों के साथ बलात्कार को नए कानून से बाहर कर दिया है।

पहले समलैंगिक या अप्राकृतिक यौन व्यवहार के लिए धारा 377 के तहत मुकदमा चलता था। लेकिन अब यह धारा खत्म कर दी गई है और इसके तहत होने वाले अपराध को किसी और धारा में नहीं शामिल किया गया है। बहरहाल, मॉब लिंचिंग के लिए नया कानून बना है तो आतंकवाद को आपराधिक कानून में शामिल किया गया है। संगठित अपराध के लिए नया कानून बना है। सरकारी अधिकारियों को ड्यूटी से रोकने के लिए आत्महत्या का प्रयास करना भी अब अपराध माना जाएगा। धरने, प्रदर्शन आदि के दौरान अक्सर ऐसी घटनाएं होती हैं।
नाम और धाराएं बदलने के क्रम में एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि सरकार ने राजद्रोह का नाम बदल कर देशद्रोह कर दिया है। अंग्रेजों के जमाने में राजद्रोह ही देशद्रोह था। यानी जो अंग्रेजी राज का विरोध करेगा उसे देश विरोधी माना जाएगा। कायदे से आजादी के बाद लोकतंत्र स्थापित होते ही इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए था क्योंकि लोकतंत्र में राजद्रोह जैसी कोई चीज नहीं होती है। लोकतंत्र में सत्ता का विरोध करना नागरिक का अधिकार होता है। बहरहाल, आजादी के 77 साल बाद इसका नाम बदला। हालांकि कानून जस का तस है। अपराध भी लगभग वही है, जो राजद्रोह में परिभाषित है। इसका सिर्फ नाम बदल गया है और धारा बदल गई है। पहले 124 के तहत मुकदमा चलता था और अब 152 के तहत चलेगा।

जिस एक बदलाव की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है या जिसका सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है वह किसी आरोपी को ज्यादा लंबे समय तक पुलिस हिरासत में रखने का कानून है। पुराने कानून के हिसाब से किसी आरोपी को अधिकतम 15 दिन तक पुलिस हिरासत में रखा जा सकता था। हालांकि अदालतें कभी भी पुलिस को 15 की रिमांड नहीं देती थीं। दो या तीन बार में ज्यादा से ज्यादा 10 या 12 दिन तक की हिरासत मिलती थी और उसके बाद आरोपी को न्यायिक हिरासत में यानी जेल में भेजना होता था। अब किसी आरोपी को 90 दिन तक पुलिस हिरासत में रखा जा सकता है। यह सही है कि अदालत के आदेश से ही रखा जा सकता है लेकिन तीन महीने की अवधि बहुत बड़ी है।

नए कानूनों में कई अच्छी बातों का प्रचार किया जा रहा है। जैसे शिकायत के तीन दिन के भीतर एफआईआर दर्ज करनी होगी। मुकदमा दर्ज करने और समन आदि भेजने में इलेक्ट्रोनिक उपकरणों का इस्तेमाल किया जाएगा। बलात्कार के मामले में सात दिन के भीतर मेडिकल रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के परिजनों को इसकी जानकारी देनी होगी। पुलिस को 90 दिन में आरोपपत्र दाखिल करना होगा और उसके 60 दिन में अदालत को आरोप तय करने होंगे। मुकदमे की सुनवाई पूरी होने के बाद 30 दिन में फैसला सुनाया जाएगा, आदि आदि। सवाल है कि यह सब कैसे होगा? क्या पुलिस को इतना प्रशिक्षित कर दिया गया है या पुलिस को इतने उपकरण उपलब्ध करा दिए गए हैं या पुलिसकर्मियों की संख्या इतनी बढ़ा दी गई है कि वे सब कुछ फुर्ती से कर सकेंगे? जब पुलिस उतनी ही है और वही है, जो पहले थी तो वह अचानक कैसे इतना सब कुछ कर लेगी?

मुकदमा पूरा होने के बाद फैसला कितने दिन में आएगा यह तो कानून से तय कर दिया गया लेकिन मुकदमा कितने दिन में पूरा होगा यह कौन तय करेगा? असली चीज तो यह है कि किसी भी मामले की जांच पूरी होने और उस पर सुनवाई पूरी होने की एक समय सीमा तय हो। यहां बिना सुनवाई शुरू हुए लोग महीनों, सालों जेल में रहते हैं। जिस अपराध में छह महीने की अधिकतम सजा होती है वैसे मामलों में भी लोग सालों जेल में बंद रहते हैं। दो साल की सजा वाले अपराध में भी जमानत नहीं मिलती है और दशकों तक सुनवाई चलती रहती है।
कहते हैं कि न्याय में देरी, अन्याय के समान है। अगर सचमुच ऐसा है तो इस देश में करोड़ों लोग सांस्थायिक अन्याय का शिकार हो रहे हैं। तभी कानूनों का नाम बदलने या अपराध की धाराएं बदल देने से कुछ नहीं होगा। अपराध न्याय प्रणाली में व्यापक सुधार से ही असली बदलाव होगा। पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ेगी और कानून व्यवस्था, अपराध की जांच और अभियोजन के लिए अलग अलग पुलिस बल होंगे, उनको बेहतर प्रशिक्षण और उपकरण दिए जाएंगे तभी कुछ बदलेगा। पुलिस बल के साथ साथ सरकार जजों के खाली पड़े पदों को भरे और अदालतों के बुनियादी ढांचे में व्यापक सुधार करे, तभी लोगों को कुछ राहत मिलेगी।

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